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अगहन बृहस्पति मा लक्ष्मी आथे

कार्तिक महीना के जाय के बाद अगहन महीना लगथे।अउ अगहन महीना मा जउँन दिन बृहस्पत वार पड़थे उही दिन हमर छत्तीसगढ़ मा घरो घर अगहन बृहस्पति के तिहार बड़ उछाह ले मनाथे।बिकट मान गौण के साथ लक्ष्मी माता के पूजा करथे। बुधवार के संझा बेरा ले घर के साफ सफाई,अँगना परछी कुरिया के लिपाई।घर के मुहाटी मा सुघर चउँक पुरके महिला मन रंगोली बनाथे।लक्ष्मी माता ला जेन जघा मढ़ाथे उहूँ जघा ला सफ्फा करके चाउँर पिसान ला घोरके चउँक पूरथे।घर के ओंटा कोंटा के साफ सफाई करके लक्ष्मी माता के स्थापना करथे।सुघर आमा पत्ता, फूल पान,नरियर,आँवला फल,आँवला पत्ती,केरा पत्ता, अउ,कंद मूल जिमी काँदा,धान के बाली मा सजा के कलश के स्थापना करथे।अउ बुधवार के रात मा सबो जूठा  बरतन भाड़ा ला माँज के रखथे,अउ घर मुहाटी ले लक्ष्मी माता के वास तक चाउँर पिसान के सुघर पैर के छप्पा बनाथे।राते मा माता करा दीया जला के रखथे। मुँधरहा ले घर के महिला मन उठ जाथे,नहा धोके घर के दुवारी,रंगोली अउ तुलसी चौंरा मा दीया जलाथे।दीया जलाके घर के दरवाजा ला खोल के रखथे।जेन हा दिन भर खुले रहिथें।पूजा पाठ करके महिला मन उपवास रहिथे अउ माता के ध्यान मा लीन रहिथे।अ...

महर्षि वेदव्यास

महाभारत की कथा लगभग सभी को ज्ञात है। पांडव और कौरव को सभी जानते हैं। लेकिन द्वापर में महाभारत का प्रमुख पात्र वेदव्यास जी हैं। कहीं ना कहीं इनके जन्म से ही महाभारत की नींव पड़ी थी। भगवान श्री कृष्ण और भगवान वेदव्यास दोनों ही विष्णु के अवतार माने जाते हैं। भगवान वेदव्यास विष्णु के ज्ञानावतार माने जाते हैं। वेदव्यास की माता सत्यवती और पिता महर्षि पराशर थे। सत्यवती का मूल नाम 'मत्स्यगंधा' था। ब्रह्मा के शाप के कारण सत्यवती को मत्स्यभाव प्राप्त हुआ था। अद्रिका नाम की अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न राजा उपरिचर वसु सत्यवती के पिता थे। मछली के पेट से जन्म होने के कारण इसका नाम मत्स्यगंधा पड़ा। मछली का पेट फाड़कर मल्लाहों ने एक बालक और एक कन्या को निकाला और राजा को सूचना दी। बालक को तो राजा ने पुत्र रूप से स्वीकार कर लिया किंतु बालिका के शरीर से मत्स्य की गंध आने के कारण राजा ने मल्लाह को दे दिया। पिता की सेवा के लिये वह यमुना में नाव चलाया करती थी। सहस्त्रार्जुन द्वारा पराशर मुनि को मृत मान कर मृतप्राय छोड़ दिया गया। माता सत्यवती ने मुनिराज की सेवा की व उनका जीवन बचाया। महर्षि ने प्रसन्न होक...